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     होम पेज > कलीसिया >  2014-07-28 15:16:41
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ईश्वर का राज्य



वाटिकन सिटी, सोमवार, 28 जुलाई 2014 (वीआर सेदोक)꞉ वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में संत पापा फ्राँसिस ने रविवार 27 अप्रैल को, भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। देवदूत प्रार्थना से पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा,
अति प्रिय भाइयो एवं बहनो,
सुप्रभात,

आज की धर्मविधि द्वारा प्रस्तावित संत मती रचित सुसमाचार पाठ ईश राज्य को समर्पित अध्याय का निष्कर्ष है। (मती.13꞉44-52)
उन दृष्टांतों में दो छोटी अति उत्कृष्ट कृतियाँ हैं꞉ खेत में छिपा हुआ ख़ज़ाना तथा मूल्यवान मोती। ये हमें बतलाते हैं कि ईश राज्य का प्रकटीकरण अचानक हो सकता है उस समय भी जब किसान खेत जोत रहा हो। संत पापा ने कहा, ″ख़ज़ाना अनापेक्षित है तथा लम्बी तलाश के बाद एक मोती व्यापारी के समान अंत में अत्यन्त मूल्यवान मोती रूप में प्राप्त हो सकता है किन्तु दोनों ही स्थितियों में पहली सच्चाई यह है कि ख़ज़ाना एवं मोती अन्य सभी वस्तुओं से मूल्यवान हैं जिसके कारण किसान एवं व्यापारी सब कुछ छोड़कर उन्हें खरीद लेते हैं। उन्हें तर्क-वितर्क या सोच-विचार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। वे तत्काल महसूस करते हैं कि उन्होंने जो पाया वह अद्वितीय है और जिसके लिए वे सब कुछ खो देने के लिए तैयार हो सकते हैं।″ संत पापा ने कहा कि उसी प्रकार ईश्वर का राज्य भी है जो व्यक्ति उसे प्राप्त करता है उसे किसी प्रकार का संदेह नहीं होता है। उसे लगता है कि उसने वही पा लिया है जिसकी वह तलाश कर रहा था तथा जिसका इंतजार कर रहा था और जिसने उसकी प्रामाणिक आकांक्षाओं को पूरा किया है। यह सच है कि जो येसु को जानता है और जिसने उनके साथ व्यक्तिगत रूप से साक्षात्कार किया है तथा उनकी अत्यधिक करूणा, सच्चाई, सुन्दरता, विनम्रता एवं सादगी से मोहित और आकर्षित है, वह येसु को खोजता और उनसे मुलाकात करता है क्योंकि वे महान ख़ज़ाना हैं।

कितने लोगों एवं संतों ने उदार हृदय से सुसमाचार का पाठ किया क्योंकि वे येसु से बहुत अधिक आकर्षित थे जिन्होंने उनका मन परिवर्तन किया, जैसे असीसी के संत फ्राँसिस। वे पहले से ख्रीस्तीय थे किन्तु गुलाब जल ख्रीस्तीय की तरह। उन्होंने सुसमाचार का पाठ किया जो उनकी युवावस्था का एक निर्णायक क्षण था। उन्होंने येसु से मुलाकात की तथा उनमें ईश्वर के राज्य को पहचाना, तब से उनमें इस पृथ्वी पर प्रसिद्धि की अभिलाषा ग़ायब हो गयी। सुसमाचार येसु का ज्ञान देता है। हम जानते हैं कि येसु जीवित हैं हमारे हृदय में बात-चीत करते हैं तथा हमारा जीवन बदल देते हैं, अतः इसे हम होने दें। संत पापा ने कहा, ″हालांकि आप अपने जीवन को बदल सकते हैं अथवा पुराने तौर-तरीक़ों में बने रह सकते हैं। किन्तु आप दूसरे हैं, आपका पुनर्जन्म हुआ है। आपने उन सारी चीजों को पा लिया है जो अर्थपूर्ण हैं, जिनका विशिष्ट स्वाद है और जो कठिनाईयों, दुःखों एवं मृत्यु के समय में भी सर्वत्र आशा की ज्योति प्रदान करते हैं।″

संत पापा ने सलाह देते हुए कहा, ″सुसमाचार को पढ़ें। जिस पर हमने चर्चा की है उसे याद रखें। प्रत्येक दिन सुसमाचार से एक परिच्छेद पढ़ें तथा सुसमाचार की छोटी प्रति को हमेशा अपने साथ रखें। उसमें हम येसु को पायेंगे। जब येसु साथ में हैं तो सभी बातें अर्थपूर्ण हो जाती हैं और हम उस महान ख़ज़ाने को पा लेते हैं जिसे येसु ने ‘ईश्वर का राज्य’ कहा है। ईश्वर जो आप और हमारे जीवन में राज्य करते हैं। ईश्वर जो प्रेम, शांति और आनन्द हैं वे प्रत्येक व्यक्ति में वास करते हैं। ईश्वर जिन्होंने अपने आप को क्रूस पर मरने के लिए अर्पित कर दिया, उन्होंने हमें अंधकार की शक्ति से मुक्त किया तथा जीवन, सुन्दरता, अच्छाई एवं आनन्द के राज्य में प्रवेश कराया। सुसमाचार पढ़ने का अर्थ है येसु को प्राप्त करना, ख्रीस्तीय आनन्द को प्राप्त करना जो पवित्र आत्मा का वरदान है।

संत पापा ने कहा, ″प्रिय भाइयो एवं बहनो, आप ईश्वर के राज्य रूपी ख़ज़ाने को पाने का आनन्द प्राप्त करें। एक ख्रीस्तीय अपने विश्वास का परित्याग नहीं कर सकता क्योंकि प्रत्येक शब्द और प्रत्येक इशारे में, इतना तक कि बहुत ही साधारण बातों में भी येसु ख्रीस्त के माध्यम से ईश्वर प्रदत्त प्यार प्रदर्शित होता है। धन्य कुँवारी मरियम की मध्यस्थता द्वारा हम प्रार्थना करें कि हममें तथा समस्त संसार में प्यार, न्याय एवं शांति का राज्य फैल जाए।

इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया। देवदूत प्रार्थना के बाद संत पापा ने कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, कल प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने की 100 वीँ वर्षगाँठ है जो लाखों की मृत्यु एवं भारी विनाश का कारण बना था। चार वर्षों तक चले संघर्ष को संत पापा बेनेडिक्ट 15 वें ने ‘व्यर्थ वध’ कहा था जिसके पश्चात् एक नाजुक शांति की स्थापना हुई थी। इस त्रासदी की याद में कल का दिन विलाप का दिन होगा। जब हम उस दुखद घटना की याद करते हैं मैं आशा करता हूँ कि बीती गलती न दोहराई जाए किन्तु हम इतिहास से सीख ले सकें कि धीरज एवं साहस पूर्ण वार्ता द्वारा शांति की मांग पूरी की जा सकती है।

विशेषकर आज मैं तीन संकटमय क्षेत्रों की याद करता हूँ, मध्यपूर्व, ईराक और यूक्रेन। आप सभी से आग्रह करता हूँ कि मेरे साथ प्रार्थना में जुड़े रहें जिससे कि उन क्षेत्रों की जनता एवं अधिकारियों को ईश्वर प्रज्ञा तथा सामर्थ्य प्रदान करे ताकि वे हर तरह से झगड़ों को दृढ़ वार्ता, समझौते एवं मेल-मिलाप द्वारा समाप्त कर शांति के मार्ग पर आगे बढ़ सकें। सभी निर्णयों के केंद्र में निजी स्वार्थ न हो किन्तु सभी की भलाई तथा सम्मान की भावना हो। यह याद रखें कि युद्ध से सब कुछ नष्ट हो जाता है जबकि शांति में सब कुछ बना रहता है।

संत पापा ने कहा कि युद्ध कभी न हो। विशेषकर, बच्चों के लिए जो उनके सुन्दर जीवन से आशा छीन लेता है। युद्ध बच्चों को मृत्यु के शिकार बनाता, घायल करता, अपंग, अनाथ तथा खिलौने की जगह युद्ध के अवशेष प्रदान करता है। वे मुस्कुराना भी नहीं जानते। मैं सारे हृदय से अर्जी करता हूँ कृपया युद्ध बंद करें।

अंत में उन्होंने देश-विदेश से एकत्र सभी तीर्थयात्रियों एवं पयर्टकों का अभिवादन किया तथा सभी को शुभ रविवार की मंगलकामनाएँ अर्पित करते हुए प्रार्थना की अपील की।

Usha Tirkey


कांदिविदी






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